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“क्या?! यह कैसे संभव है?”
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“उस दिन वह रहस्यमयी ढंग से अदृश्य हो गया। जरा सोचिए वह कैसे अदृश्य हो सकता था? वंद्यदेवन किसी प्रकार भूमिगत राजकोष में प्रविष्ट होने और उसके मार्गों के सभी रहस्यों का पता लगाने में सफल रहा। फिर उसने आपका अनुसरण किया। जैसे ही द्वार खुला उसने पीछे से चाकू मारकर आपको एक ओर धकेल दिया और वहां से भाग निकला। कदाचित उसके विवेक ने उसे धिक्कारा इसलिए भागने से पहले वह आपको उस गूँगी स्त्री के घर छोड़ गया।”
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“देवि जैसा आप बता रही हैं निस्संदेह वैसा ही हुआ होगा! इतने दिनों तक मेरी बुद्धि को यह बात नहीं सूझी और न ही किसी और को इसका विचार आया। यदि कोई पूछे कि इस चोल देश में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कौन है तो मैं कहूंगा कि वह आप ही हैं! संसार में कुछ लोग बुद्धिमान और कुछ सुंदर होते हैं। जिसमें यह दोनों गुण हों वह ब्रह्मा की सृष्टि में दुर्लभ है। मुझे आपमें बुद्धि और सौन्दर्य दोनों का संगम दिखाई देता है!” कन्दमारन आसक्त भाव से बड़बड़ाया।
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“महोदय! क्या आप यह सब अपने हृदय से कह रहे हैं? या बस मेरी मुखस्तुति कर रहे हैं जैसे सामान्य पुरुष अपरिचित महिलाओं की किया करते हैं।”
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“यह मुखस्तुति नहीं है। जो मेरे हृदय में है सच में वही कह रहा हूं।”
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“तो आपको मुझ पर पूरा विश्वास है? क्या मुझ पर विश्वास करके आप मेरी एक सहायता करेंगे?”
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“मुझसे जो हो सकता है वह करने के लिए उद्धत हूं।”
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“मेरे लिए आपको कांची जाना होगा।”
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“काशी जाने को भी कहेंगी तो वहां भी चला जाऊंगा!”
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“उतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। आपको मेरा एक पत्र कांची स्थित राजकुमार आदित्य करिकाल तक पहुंचाकर उन्हें अतिथि के रूप में कडम्बूर में अपने महल में आमंत्रित करना होगा।
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“देवि! यह आप क्या कह रही हैं? क्या आप अपने पति, मेरे पिता और इस चोल साम्राज्य के अन्य मंत्रियों द्वारा इस साम्राज्य को लेकर की जा रही व्यवस्थाओं से अनभिज्ञ हैं?”
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‘मुझे सब पता है। बल्कि मैं और भी रहस्य जानती हूं। आपके परिवार, मेरे परिवार और इस देश के कई अन्य महत्वपूर्ण परिवारों पर गंभीर विपत्ति मंडरा रही है। पता है इस विपत्ति का कारण कौन है?
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“बताइए देवि!”
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“वही दुष्टा जो अतिथि के रूप में आज यहां आई थी!”
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“ओह! आपका अभिप्राय छोटी महारानी कुंदवई देवी से है?”
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“मैं उसी नागिन की बात कर रही हूं। एक नाग दूसरे नाग को जानता है। कुंदवई की चालों को बस नंदिनी ही समझती है। उसने आपके मित्र वंद्यदेवन को लंका भेजा है। पता हैं क्यों? औषधि लाने की बात सरासर झूठ है। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि सुंदर चोल बचेंगे या नहीं। उसकी मंशा है कि उनके बाद मधुरान्तक अथवा आदित्य करिकाल सिंहासन पर न बैठ जाएं बल्कि उसका प्यारा भाई अरुलमोड़ी वर्मन ही उनका उत्तराधिकारी बने। अरुलमोड़ी वर्मन का राज्याभिषेक होने पर वह उसे अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। तब तो कुंदवई देवी ही चोल सम्राज्ञी होगी न! और सम्राट कौन होगा पता है? आपका प्रिय मित्र वंद्यदेवन!”
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ओह! क्या यह संभव है? हमें हर हाल में इसे रोकना होगा। हमें शीघ्रातिशीघ्र मेरे पिता और महाराज पड़लुवूर को सूचित करना चाहिए।
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“उन्हें बताने का कोई लाभ नहीं है। वे हम पर विश्वास नहीं करेंगे। हमें चतुराईपूर्वक कुंदवई की चालों को विफल करना होगा। आपकी सहायता से यह संभव है।
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“आज्ञा दीजिए, देवि!”
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“इस पत्र को अत्यंत सावधानीपूर्वक कांची स्थित आदित्य करिकालन तक पहुंचा दीजिए। पहुंचा सकेंगे?” यह कहकर उसे पत्र मंजूषा देने के लिए नन्दिनी ने अपना हाथ बढ़ाया। मोहजाल में फंसा कंदनमारन अपने होश खो बैठा और पत्र मंजूषा के बजाय उसने नन्दिनी का हाथ थाम लिया। “मैं आपके लिए कुछ भी करूँगा!” वह बड़बड़ाया।
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उसी क्षण एक चरमराहट सुनाई दी। महल को लतामंडप से जोड़ने वाले मार्ग पर महाराज पड़लुवूर तेज कदमों से बढ़ रहे थे। उनके सहसा आगमन से चकित दासी एक ओर हट गयी। लतामंडप के द्वार के पास लटकते हुए धातु के त्रिकोण पर श्रंखला से बंधा हुआ एक बड़ा तोता बैठा था। इससे अनजान महाराज पड़लुवूर ने तोते को अपनी हथेली में भींच लिया। उनके हृदय का आवेग उनके हाथ में प्रवाहित हो रहा था। पड़लुवूर की कसी हुई पकड़ से कातर शुक अपने पंख फड़फड़ाते हुए चीखने लगा।
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