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राजकुमार! मैं अत्यंत संकोच और भय के साथ यह पत्र लिख रही हूँ। राज्य की दशा के बारे में कई समाचार मुझ तक पहुँचे हैं। ऐसा लगता है कि आप किसी भी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। रोग से दुर्बल आपके पिता के बार-बार संदेश भेजने पर भी आप तंजावुर नहीं आए हैं। मुझे इस बात से बहुत कष्ट होता है कि कहीं इसका कारण मैं तो नहीं हूँ। यदि मैं आपसे एक बार मिल पाती तो आपके सारे संदेह दूर कर सकती थी। क्या आप मुझ पर यह कृपा करेंगे?
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यदि आप तंजावुर नहीं आना चाहते, तो हम कडंबुर सांबुवरायर महल में मिल सकते हैं। रिश्ते में मैं आपकी दादी लगती हूँ; तो हमारे मिलने और बातचीत करने में क्या आपत्ति हो सकती है? यह संदेश लाने वाला सांबुवरायर का पुत्र है जो कि एक साहसी युवक है। आप उस पर पूरा विश्वास कर सकते हैं और कोई भी बात उसे बता सकते हैं। —आपकी, जन्म से अभागी नंदिनी।
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उक्त पत्र लिखने के बाद सच में अत्यंत संकोच और गहरे सोच-विचार के पश्चात नंदिनी ने उस दासी की ओर देखा जो उसे पंखा झल रही थी और कहा, “जाओ और कडंबूर के राजकुमार को तुरंत बुला लाओ!”
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दासी कंदनमारन को भीतर लाई और उसे वहीं छोड़कर थोड़ी दूर खड़ी हो गई।
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कंदनमारन नंदिनी को सीधे देखने में सकुचा रहा था इसलिए वह उद्यान की ओर देखता रहा।
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“बैठिए महोदय!” नंदिनी के स्वर के कंपन ने कंदनमारन को उसका मुख ध्यान से देखने के लिए विवश कर दिया।
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वह मुस्कुराते हुए बोली, “कुंदवई को निहार चुकी आपकी दृष्टि यदि मुझे अनदेखा कर दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।” इस बात से कंदनमारन का हृदय आहत हो गया किंतु नंदिनी की मुस्कान ने उसे मुग्ध कर दिया। हकलाते हुए उसने कहा, “हजारों कुंदवई भी एक नंदिनी देवी के सामने कुछ नहीं हैं!”
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“तथापि राजकुमारी के संकेत भर से आप स्वर्ग जाकर इंद्र का सिंहासन छीन लाएंगे किंतु मैं चाहे जितनी विनती करूं, आप बैठने की भी कृपा नहीं करेंगे!”
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कंदनमारन तुरंत उसके सामने बने आसन पर बैठ गया और बोला, “आपकी आज्ञा हो तो मैं ब्रह्मलोक जाकर ब्रह्मा का सिर काट लाऊं!”
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नंदिनी सिहर उठी। कंदनमारन से दृष्टि हटाकर उसने कहा, “भगवान शिव द्वारा एक सिर काट दिये जाने पर भी ब्रह्मा के पास चार सिर बचे हैं। यदि आपने एक और सिर काट भी लिय, तब भी ब्रह्मा जीवित ही रहेंगे!”
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कंदनमारन ने कहा, “देवी! चाहे जो बात कर लीजिए किंतु कुंदवई देवी का नाम मत लीजिए और न ही उनकी प्रशंसा कीजिए। उसने मुझसे विश्वासघात करने वाले वंद्यदेवन का पक्ष कैसे लिया यह सोचकर मेरा रक्त खौल उठता है!”
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“पर आज सुबह आपने जिस कल्पनाशीलता से अपने और अपने मित्र के बीच हुए द्वंद्वयुद्ध के विषय में बातें कीं वह वास्तव में अद्भुत थी!” नंदिनी की बात से कंदनमारन जरा लज्जित हो गया।
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“मुझे उससे अपनी मुलाकात के बारे में कुछ तो बताना ही था ना? इसीलिए मैंने ऐसा कहा। यह सच है कि उसने मेरी पीठ में छुरा घोंपा था!” उसने उत्तर दिया।
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“महोदय! क्या यह श्रेष्ठ नहीं होगा कि आप उस दिन हुई सभी बातों को याद करें और उन पर पुन: विचार करें?” नंदिनी ने पूछा।
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“क्या आपको भी मेरी बात पर संदेह है?”
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“मुझे संदेह नहीं है। किंतु कुछ बातें ऐसी हैं जिन पर आपने ध्यान नहीं दिया। जब वंद्यदेवन को पकड़कर यहाँ लाया जाएगा तब उस पर लगाए गए आपके आरोप सच साबित होने चाहिए, है ना?”
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“मुझे उस बात में कोई रुचि नहीं है। मैं अब भी उसे क्षमा करना चाहता हूँ।”
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“मैं आपकी उदारता की सराहना करती हूँ। हालाँकि, हमारे बीच सच्चाई का पता लगाना ही बेहतर है। कृपया उस रात की घटनाओं को एक बार फिर याद करने का प्रयास करें। जब आप भूमिगत मार्ग से आए थे, तो रास्ते में आपकी मुलाकात पड़लुवूर और मुझसे हुई थी। क्या आपको याद है?”
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“मुझे भली भांति स्मरण है। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं इसे कभी नहीं भूल सकता।”
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“तब आपने क्या कहा था, वह भी स्मरण है ना?”
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“मुझे स्मरण नहीं कि मैंने क्या कहा था। मैं तो आपको देखकर पूरी तरह मुग्ध हो गया था।”
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“पर मुझे आपकी कही बात अच्छी तरह याद है। आपने कहा था, ‘महाराज! मैंने आपकी पुत्री के सौंदर्य की बहुत प्रशंसा सुनी थी किंतु वास्तव में वह कहीं अधिक सुंदर हैं।’”
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“अरे बाप रे! क्या मैंने सच में ऐसा कहा था? कदाचित इसीलिए उनका चेहरा इतना लाल हो गया था! अब भी वह मुझे पसंद नहीं करते…”
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नंदिनी मुस्कुराई और बोली, “वे आपको पसंद नहीं करते तो कोई बात नहीं; आप तो उन्हें पसंद करते हैं ना? यही पर्याप्त है!”
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“देवि! आपसे छिपाने का क्या लाभ? सच कहूं तो मैं भी उन्हें पसंद नहीं करता हूं,” कंदनमारन ने कहा।
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“कोई बात नहीं! वे मुझे पसंद हैं; बस इतना पर्याप्त है। मैंने कई तप किए होंगे जो मुझे ऐसे पति मिले?” उसने कहा।
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यह सुनकर कंदनमारन चकित रह गया। वह चुप रहा, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे।
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“छोड़ो भी; हमें उस भूमिगत कक्ष में देखने के बाद आपने क्या किया?” नंदिनी ने पूछा।
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“एक मशाल लिए हुए पहरेदार आगे-आगे चल रहा था। मैं उसके पीछे-पीछे चला, मेरा सारा ध्यान आप पर ही केंद्रित था। पहरेदार ने किले की दीवार का एक गुप्त हिस्सा खोला और एक तरफ हट गया। मैं अंदर चला गया। तुरंत ही किसी ने मेरी पीठ में छुरा घोंप दिया—मुझे बस इतना ही याद है। वंद्यदेवन को कदाचित किसी तरह पता चल गया था कि मैं वहाँ आऊँगा और वह बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।”
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“नहीं, महोदय! आपका अनुमान बिल्कुल गलत है। वह बाहर प्रतीक्षा नहीं कर रहा था।”
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“तो, आप भी उससे मिली हुई हैं?”
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“मैं उससे क्यों मिलूं? मुझे इससे क्या लाभ होगा? या उसे इससे क्या लाभ होगा? मुझे तो पूरा विश्वास है कि ऐसा ही हुआ होगा।”
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“बताओ देवी! कैसे!”
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“वंद्यदेवन बाहर प्रतीक्षा नहीं कर रहा था!…”
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“तो फिर कौन प्रतीक्षा कर रहा था?”
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“कोई नहीं; मैंने कहा न कि वंद्यदेवन बाहर प्रतीक्षा नहीं कर रहा था? वह तो उस सुरंग के भीतर ही प्रतीक्षा कर रहा था!”
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“क्या?! यह कैसे संभव है?”
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“उस दिन वह रहस्यमयी ढंग से अदृश्य हो गया। जरा सोचिए वह कैसे अदृश्य हो सकता था? वंद्यदेवन किसी प्रकार भूमिगत राजकोष में प्रविष्ट होने और उसके मार्गों के सभी रहस्यों का पता लगाने में सफल रहा। फिर उसने आपका अनुसरण किया। जैसे ही द्वार खुला उसने पीछे से चाकू मारकर आपको एक ओर धकेल दिया और वहां से भाग निकला। कदाचित उसके विवेक ने उसे धिक्कारा इसलिए भागने से पहले वह आपको उस गूँगी स्त्री के घर छोड़ गया।”
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“देवि जैसा आप बता रही हैं निस्संदेह वैसा ही हुआ होगा! इतने दिनों तक मेरी बुद्धि को यह बात नहीं सूझी और न ही किसी और को इसका विचार आया। यदि कोई पूछे कि इस चोल देश में सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कौन है तो मैं कहूंगा कि वह आप ही हैं! संसार में कुछ लोग बुद्धिमान और कुछ सुंदर होते हैं। जिसमें यह दोनों गुण हों वह ब्रह्मा की सृष्टि में दुर्लभ है। मुझे आपमें बुद्धि और सौन्दर्य दोनों का संगम दिखाई देता है!” कन्दमारन आसक्त भाव से बड़बड़ाया।
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“महोदय! क्या आप यह सब अपने हृदय से कह रहे हैं? या बस मेरी मुखस्तुति कर रहे हैं जैसे सामान्य पुरुष अपरिचित महिलाओं की किया करते हैं।”
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“यह मुखस्तुति नहीं है। जो मेरे हृदय में है सच में वही कह रहा हूं।”
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“तो आपको मुझ पर पूरा विश्वास है? क्या मुझ पर विश्वास करके आप मेरी एक सहायता करेंगे?”
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“मुझसे जो हो सकता है वह करने के लिए उद्धत हूं।”
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“मेरे लिए आपको कांची जाना होगा।”
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“काशी जाने को भी कहेंगी तो वहां भी चला जाऊंगा!”
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“उतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। आपको मेरा एक पत्र कांची स्थित राजकुमार आदित्य करिकाल तक पहुंचाकर उन्हें अतिथि के रूप में कडम्बूर में अपने महल में आमंत्रित करना होगा।
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“देवि! यह आप क्या कह रही हैं? क्या आप अपने पति, मेरे पिता और इस चोल साम्राज्य के अन्य मंत्रियों द्वारा इस साम्राज्य को लेकर की जा रही व्यवस्थाओं से अनभिज्ञ हैं?”
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‘मुझे सब पता है। बल्कि मैं और भी रहस्य जानती हूं। आपके परिवार, मेरे परिवार और इस देश के कई अन्य महत्वपूर्ण परिवारों पर गंभीर विपत्ति मंडरा रही है। पता है इस विपत्ति का कारण कौन है?
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“बताइए देवि!”
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“वही दुष्टा जो अतिथि के रूप में आज यहां आई थी!”
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“ओह! आपका अभिप्राय छोटी महारानी कुंदवई देवी से है?”
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“मैं उसी नागिन की बात कर रही हूं। एक नाग दूसरे नाग को जानता है। कुंदवई की चालों को बस नंदिनी ही समझती है। उसने आपके मित्र वंद्यदेवन को लंका भेजा है। पता हैं क्यों? औषधि लाने की बात सरासर झूठ है। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि सुंदर चोल बचेंगे या नहीं। उसकी मंशा है कि उनके बाद मधुरान्तक अथवा आदित्य करिकाल सिंहासन पर न बैठ जाएं बल्कि उसका प्यारा भाई अरुलमोड़ी वर्मन ही उनका उत्तराधिकारी बने। अरुलमोड़ी वर्मन का राज्याभिषेक होने पर वह उसे अपनी उंगलियों पर नचा सकती है। तब तो कुंदवई देवी ही चोल सम्राज्ञी होगी न! और सम्राट कौन होगा पता है? आपका प्रिय मित्र वंद्यदेवन!”
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ओह! क्या यह संभव है? हमें हर हाल में इसे रोकना होगा। हमें शीघ्रातिशीघ्र मेरे पिता और महाराज पड़लुवूर को सूचित करना चाहिए।
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“उन्हें बताने का कोई लाभ नहीं है। वे हम पर विश्वास नहीं करेंगे। हमें चतुराईपूर्वक कुंदवई की चालों को विफल करना होगा। आपकी सहायता से यह संभव है।
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“आज्ञा दीजिए, देवि!”
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“इस पत्र को अत्यंत सावधानीपूर्वक कांची स्थित आदित्य करिकालन तक पहुंचा दीजिए। पहुंचा सकेंगे?” यह कहकर उसे पत्र मंजूषा देने के लिए नन्दिनी ने अपना हाथ बढ़ाया। मोहजाल में फंसा कंदनमारन अपने होश खो बैठा और पत्र मंजूषा के बजाय उसने नन्दिनी का हाथ थाम लिया। “मैं आपके लिए कुछ भी करूँगा!” वह बड़बड़ाया।
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उसी क्षण एक चरमराहट सुनाई दी। महल को लतामंडप से जोड़ने वाले मार्ग पर महाराज पड़लुवूर तेज कदमों से बढ़ रहे थे। उनके सहसा आगमन से चकित दासी एक ओर हट गयी। लतामंडप के द्वार के पास लटकते हुए धातु के त्रिकोण पर श्रंखला से बंधा हुआ एक बड़ा तोता बैठा था। इससे अनजान महाराज पड़लुवूर ने तोते को अपनी हथेली में भींच लिया। उनके हृदय का आवेग उनके हाथ में प्रवाहित हो रहा था। पड़लुवूर की कसी हुई पकड़ से कातर शुक अपने पंख फड़फड़ाते हुए चीखने लगा।
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