त्रिशूर पूरम मलयालम कालगणना के अनुसार मेडम माह (अप्रेल-मई) में चंद्रमा के पूरम नक्षत्र में प्रवेश करने के दिन मनाया जाने वाला एक भव्य वार्षिक उत्सव है। दो सौ वर्ष पूर्व कोच्चि के राजा शक्तन तांपुरन ने इस उत्सव को मनाना प्रारंभ किया था। इसका आयोजन त्रिशूर के वडक्कनाथन (शिव) मंदिर में होता है। त्रिशूर पूरम में होने वाले मुख्य समारोह हैं कोडियेट्टम अर्थात् ध्वजारोहण; विलम्बरम अर्थात् उद्घोषणा; मडतिल वरव अर्थात् उत्सव के प्रतिभागी दस मंदिरों जैसे परमेक्काव,तिरुवम्बड़ी के देवताओं का हाथियों पर सवार होकर वडक्कनाथन की ओर प्रस्थान; इलंजितरा मेलम अर्थात् मौलश्री के वृक्ष तले चेण्डा, मद्दलम, कोम्ब, तिमिल, इलत्तालम, और इडक्क जैसे पारंपरिक वाद्यों का वृंद वादन; कूडमाट्टम अर्थात् रंग बिरंगी छतरियों का लयात्मक आदान-प्रदान; एड़ुन्नल्लिप्प अर्थात् हाथियों पर सवार देव प्रतिमाओं की मंदिर के प्रागंण की परिक्रमा और वेडिकेट्ट अर्थात् आतिशबाजी।
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त्रिशूर पूरम में सजे धजे हाथियों की शोभा देखते ही बनती है। हाथियों को नेटिपट्टम, वेण्चामरम, आलवट्टम, मुतुकूड अर्थात् रेशमी छतरियों, रंगीन रेशमी वस्त्र और सुनहरी और रूपहली घंटियों से सजाया जाता है। इस साजो सामान की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है जिसे आन चमयम कहते हैं। त्रिशूर पूरम देखने के लिए अपार जनसमूह उमड़ता है।
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त्रिशूर पूरम में अभी पर्याप्त समय शेष है किंतु सोशल मीडिया में लोग त्रिशूर पूरम के एक गीत पर अभी से झूमने लगे हैं। इस गीत में त्रिशूर पूरम जाने के लिए उत्कंठित कोई युवती अपने कांत अर्थात् प्रिय को संबोधित करते हुए कह रही है:
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कांता ञानुम् वराम त्रिशूर पूरम काणान
हे कान्त! मैं भी त्रिशूर पूरम देखने आऊंगी
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कांता ञानुम् वराम त्रिशूर पूरम काणान
हे कान्त! मैं भी त्रिशूर पूरम देखने आऊंगी
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पूरम एनिक्कोन्नु काणण कांता
मुझे भी त्रिशूर पूरम जरा देखना है प्रिय
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पूरम अदिलोन्नु कूडणम् कांता
मैं भी त्रिशूर पूरम में भाग लेना चाहती हूं प्रिय
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कांता ञानुम् वराम त्रिशूर पूरम काणान…..
हे कान्त! मैं भी त्रिशूर पूरम देखने आऊंगी
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तिमिलयेनिक्कोन्नु काणण कांता
मुझे तिमिळ वाद्य जरा देखना है प्रिय
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तिमिलयेनिक्कोन्नु कोट्टण कांता
मैं तिमिळ वाद्य को बजाना चाहती हूं प्रिय
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कांता ञानुम् वराम त्रिशूर पूरम काणान….
हे कान्त! मैं भी त्रिशूर पूरम देखने आऊंगी
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मद्दलम एनिक्कोन्नु काणण कांता
मैं मद्दल अर्थात् काष्ठ के ढोल को जरा देखना चाहती हूं प्रिय
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मद्दलम एनिक्कोन्नु कोट्टण कांता
मैं मद्दल जरा बजाना चाहती हूं प्रिय
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कांता ञानुम् वराम त्रिशूर पूरम काणान…..
हे कान्त! मैं भी त्रिशूर पूरम देखने आऊंगी
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वेडिकेट्ट एनिक्कोन्नु काणण कांता
मुझे अग्निकौतुक अर्थात् आतिशबाजी जरा देखनी है प्रिय
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वेडिकुट्टि अदिलोन्न कोळुतण कांता
मुझे जरा आतिशबाजी चलानी है प्रिय
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कांता ञानुम् वराम त्रिशूर पूरम काणान…..
हे कान्त! मैं भी त्रिशूर पूरम देखने आऊंगी
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यह गीत त्रिशूर पूरम के अवसर पर दशकों से और पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जाता रहा है किंतु इसकी शब्दावली लोकगीत जितनी पुरानी नहीं है। इसकी हालिया लोकप्रियता का श्रेय जाता है मसाला कॉफी संगीत समूह को जिसने इसे समकालीन रुचि के अनुसार ढालकर प्रस्तुत किया और उन सब लोगों को भी जो इस पर थिरकते हुए रील बना रहे हैं।
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त्रिशूर पूरम का एक मुख्य आकर्षण तेचीकोट्टकाव रामचन्द्रन नाम का उनसठ वर्षीय वह हाथी भी है जिसे स्नेहपूर्वक रामन बुलाया जाता है। यह एशिया का द्वितीय विशालतम हाथी माना जाता है और इसे एकछत्राधिपति की उपाधि प्रदान की गयी है। पूर विलम्बरम में एक हाथी नेयदलकाविलम्मा की प्रतिमा मस्तक पर उठाए वडक्कनाथन मंदिर के तेक्क नाड अर्थात् दक्षिणी द्वार को धकेलकर खोलता है। विगत कई वर्षों से इस भूमिका का निर्वाह करते हुए तेचीकोट्टकाव रामचन्द्रन ने अपनी उपस्थिति से दर्शकों को भावविभोर किया है।
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