जल्लीकट्ट पोंगल उत्सव की एक रोमांचकारी परंपरा है जिसका शाब्दिक अर्थ है बैल के सींगों पर आभूषण बांधना। मध्यकाल और उन्नीसवीं सदी के आरंभ में जल्ली दक्षिण भारत में प्रचलित एक प्रकार का सिक्का था। जल्ली अथवा स्वर्णाभूषणों को बैल के सींगों पर बाँधे (कट्ट) जाने के कारण यह जल्लीकट्ट कहलाने लगा। पोंगल के अवसर पर बैल को वश में करके उसके सींगों से इन सिक्कों या सोने के आभूषणों की रस्सी को निकाला जाता है। जल्लीकट्टू के पर्याय हैं एड़ताड़ुवुदल (बैल का आलिंगन), मंज विरट्ट (बैल का पीछा करना) और माडपिडिदल (बैल को पकड़ना) किंतु वर्तमान में जल्लीकट्ट नाम ही अधिक प्रचलित है।
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संगम साहित्य में जल्लीकट्ट का उल्लेख सर्वप्रथम कलितोगई की सात लंबी कविताओं में मिलता है जिनकी तीन सौ से अधिक सुंदर पंक्तियों में वर्णन किया गया है कि बैल को वश में करने वाला पराक्रमी ही किसी मृगनयनी से विवाह करेगा। सिलप्पदिकरम में भी उल्लेख है कि तमिलों की परंपरा है कि एक कन्या का विवाह उसी से होगा जो पोंगल उत्सव के दौरान बैल का पीछा करेगा। नीलगिरि के कर्रिक्कियुर गाँव में मिले 3500 साल पुराने शैलचित्र और मदुरै के कल्लुद मेट्टपट्टी में प्राचीन तमिलों द्वारा बैल का पीछा करने के चित्र है। इसके अतिरिक्त अत्तूर के पीठनाचिपलायम में मिली 400 साल पुरानी एक स्मारक मूर्ति ने बैल को वश में करने वालों के लिए एक स्मारक शिला लगाने की परंपराओं की ओर ध्यान खींचा है। मदुरै में मिली कोर्क्कइपांडियनमारन के शासनकाल की तमिल ब्राह्मी लिपि वाली मुद्राओं में एक युवक को बैल का पीछा करते हुए दिखाया गया है। वर्तमान में जल्लीकट्ट की परंपरा मदुरै, डिंडीगल, तिरुनेलवेली, तिरुचिरापल्ली, तेनी, पुदुकोट्टई, सिवगंगै और रामनाथपुरम जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में ही लोकप्रिय है जहां कभी पांडियन साम्राज्य था।
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जल्लीकट्ट प्रारंभ करने से पूर्व गांव के बुजुर्गों का एक समूह प्रत्येक घर और झोपड़ियों में एच्चितोलिदल (पोंगल बनाने के बाद बचे हुए पवित्र जल) का छिड़काव) करता है और “पोंगालो पोंगल, पलपनापोंका, पट्टी पेरुका, पर्तकन्नु पडिरेंन्ड्र वेडिक्का, नोइनोडिएल्लाम तेरुवोड ओड” का घोष करता है। इसमें कहा गया है कि दूध के बर्तन में पोंगल का उगना, मवेशियों का बढ़ना और बुरी नजर को नष्ट करना और मिट्टी से रोगों को नष्ट करना है। मान्यता है कि ये अनुष्ठान उनके घर को पवित्र बनाते हैं और रोगों से उनके मवेशियों की रक्षा करते हैं। यह तमिल कृषक समुदाय के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठानों में से एक है। जल्लीकट्ट की क्रीड़ा कोइलकालै (मंदिर के बैल) को पहली बार छोड़ने के साथ प्रारंभ होती है और इस बैल को कोई वश में नहीं करता क्योंकि यह भगवान का बैल है। इसके बाद शेष बैलों को तोलुवम से एक-एक करके वाडिवासल के रास्ते छोड़ दिया जाता है।
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वाडिवासल का अर्थ है अखाड़ा। इसी नाम से जल्लीकट्ट को केन्द्र में रखकर लिखा गया एक प्रसिद्ध तमिळ उपन्यास भी है जिसके मूल रचनाकार हैं एन कल्याण रामन। 88 पृष्ठों का यह उपन्यास एक दोपहर की घटनाओं के इर्द गिर्द घूमता है जब बैल और मनुष्य का सामना होता है और मानवीय भावनाओं, इच्छाओं, मित्रता, संकीर्णता का नाटक प्रारंभ होता है। यह उपन्यास अपने केन्द्रीय पात्र, एक वृद्ध के द्वारा पिच्ची के पिता, अम्बुलितेवन की मृत्यु की बात करता है जिसे कुछ वर्ष पूर्व कारी नामक बैल ने वाडीवासल में जान से मार डाला था जब वे उसे नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा था।
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तमिल सिनेमा में दीर्घकाल से जल्लीकट्ट को तमिल पौरुष, संस्कृति और पराक्रम के प्रतीक के रूप में महिमामंडित किया जाता रहा है। तायै कदै तनयन, मुरट्टकलई, विरुमांडी और बाद में करप्पन जैसी सफल फिल्मों में नायकों को बैलों को वश में करके अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए दिखाया गया है और इसे बहुधा जातिगत गौरव से जोड़ा जाता है। हालांकि इलमी, मर्सल, कारी जैसी कुछ हालिया फिल्में और पेट्टैकाली वेबश्रंखला इसके पारंपरिक, ऐतिहासिक स्वरूप को चित्रित करती हैं। बहुचर्चित मलयालम फिल्म जल्लीकट्ट में मानव की आदिम प्रवृत्ति को बड़ी संवेदनशीलता से चित्रित किया गया है। जल्लीकट्ट की तुलना स्पेनिश बुल टेमिंग से करना स्वाभाविक है किंतु दोनों खेलों में कुछ अंतर भी हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।
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जल्लीकट्ट को मंजविरट्ट भी कहते हैं और इसे कई प्रकार से खेला जाता है जैसे:
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वाडी मंजविरट्ट जिसमें बैल को एक बंद जगह यानी वाडिवासल से छोड़ा जाता है जहां से पुरुष योद्धा उसका कुक्कुद पकडने की चेष्टा करते हैं।
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वेली मंजविरट्ट जिसमें बैलों को क्रीड़ास्थल में सीधे छोड़ दिया जाता है। यह तरीका सिवगंगै और मदुरै में प्रचलित है।
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वटम विरट्ट जिसमें बैलों को 15 सेंटीमीटर रस्सी से बांधा जाता है और उन्हें खुलकर घूमने दिया जाता है। लोगों का एक समूह सींग पर बंधी थैली को पकड़ने का प्रयास करता है।
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दिलचस्प बात है कि प्रतियोगी यदि बैल का कुक्कुद पकडने में विफल रहते हैं और सिर्फ उसकी गर्दन, सींग और पूंछ ही पकड़ पाते हैं तो उन्हें प्रतियोगिता से बाहर कर दिया जाता है। प्रतियोगियों को जीतने के लिए बैल के कुक्कुद को कम से कम 30 सेकण्ड तक पकड़ना होता है या फिर 15 मीटर की दूरी से पकड़ना होता है।
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भारत की 37 देशी गायों की नस्लों में से बड़ी संख्या तमिलनाडु में मिलती है जिनमें कांगेयम, तिरुचेंगोड़, बरगुर, पलमलै, आलमबड़ी, कोल्लिमलै, वडकरै, मनप्परै, उम्बलाचेरी, इरुच्चली, पुलिकुलम, तांबिरन माड, तेनपांडी, तोंडैनाड, तुरिंजितलै और पुंगनूर शामिल हैं। इनमें मुख्य रूप से सिवगंगई की पुलिकुलम नस्ल का उपयोग जल्लीकट्ट के लिए किया जाता है। इस नस्ल को पलिंगमाड, मनिमाड, जल्लीकट्ट माड, माट्ट माड और किलकट्ट माड भी कहते हैं। इस नस्ल के बैल बड़े कुक्कुद वाले, फुर्तीले, और शक्तिशाली होते हैं। जल्लीकट्ट की लोकप्रियता का सकारात्मक प्रभाव इस नस्ल के संरक्षण पर पड़ा है।
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जल्लीकट्ट एक जोखिम भरा खेल है जिसमें बैल और उसे काबू करने वाले लोगों की जान भी दांव पर लगती है। इसी की दुहाई देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में जल्लीकट्ट पर प्रतिबंध लगाया था जिसका तमिळनाड में पुरजोर विरोध हुआ। 2016 में जारी हुआ तमिळ गीत टक्कर टक्कर इस विरोध का आंदोलन गीत बनकर बहुत लोकप्रिय हुआ।
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