वैरमुत्तु का ज्ञान और ज्ञानपीठ की गर‍िमा

Ajay Singh Rawat/ April 2, 2026
वैरमुत्तु

वर्ष 2025 के ज्ञानपीठ पुरस्‍कार के ल‍िए तम‍िळ कव‍ि और स‍िने गीतकार वैरमुत्तु को चुना गया है। तम‍िळ उपन्‍यासकार अक‍िलन और जयकांतन के उपरांत ज्ञानपीठ पाने वाले वे तीसरे तम‍िळ साह‍ित्‍यकार हैं। तम‍िळ भाषा के ल‍िए यह पुरस्‍कार चौबीस वर्ष के सुदीर्घ अंतराल पर द‍िया गया है। इसल‍िए एक ओर जहां इस घोषणा से तम‍िळ भाष‍ियों के मन ख‍िल उठे वहीं वैरमुत्तु से वैर पालने वाली गाय‍िका च‍िन्‍मयी श्रीपदा के अत‍िर‍िक्‍त कुछ तम‍िळ व‍िद्वानों ने भी इस पर अपनी नाराजगी जताई है।
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तम‍िळ में वैरमुत्तु का शाब्‍द‍िक अर्थ‍ है हीरा मोती और उन्‍होंने ने अपनी प्रत‍िभा से मानों अपने नाम को सार्थ‍क भी क‍िया है। वह तम‍िळ स‍िनेमा के गीतकार के रूप में अत्‍यंत लोकप्र‍िय है और यह कोई अकेला साह‍ित्‍यि‍क पुरस्‍कार नहीं है ज‍ो उन्‍हें म‍िला हो। ज्ञानपीठ से पूर्व भी वे कई पुरस्‍कार अपने नाम कर चुके हैं ज‍िनमें पद्मश्री, पद्मभूषण, गीत लेखन के ल‍िए सात बार राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार, साह‍ित्‍य अकादमी और तम‍िळ सरकार द्वारा द‍िया जाने वाला कलैमामन‍ि पुरस्‍कार उल्‍लेखनीय हैं।
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तम‍िळ स‍िनेमा में वैरमुत्तु की यात्रा 1980 में न‍िड़लगल चलच‍ित्र से हुई और उनका ल‍िखा प्रथम गीत पोन मालै पोड़ुद इलैयाराजा के संगीत न‍िर्देशन में एस पी बालासुब्रह्मण्‍यम ने गाया था। वर्षों पूर्व रोज़ा फ‍ि‍ल्‍म के ज‍िस मासूम‍ियत भरे गीत “द‍िल है छोटा सा, छोटी सी आशा” गीत ने ह‍िन्‍दी दर्शकों और संगीत प्रेम‍ियों का द‍िल जीत ल‍िया था वह मूलत: वैरमुत्तु की कलम से न‍िकला एक तम‍िळ गीत च‍िन्‍ना च‍िन्‍ना आसै ही था।

 
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ज‍िन गीतों के ल‍िए  वैरमुत्तु को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार म‍िला वे हैं:
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1985 पूंगाट्र पुद‍िदानद (मुदल मर्यादै)
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1992 च‍िन्ना च‍िन्ना आसै (रोजा)
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1994 पोरले पोन्‍नुताय‍ि (करुतम्‍मा) और उय‍िरम नीये (पव‍ित्रा)
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1999 मुदल मुरै क‍िल‍िप्‍पार्तेन (संगमम)
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2002 ओरु दैवम तन्‍ता पूवे (कन्‍नत‍ि मुत्तमि‍ट्टाल)
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2010 कल्‍ल‍ि काट्ट‍िल प‍िरन्‍द ताये (तेनमेर्क पारुवाकाट्र)
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2016 एन्‍दा पक्‍कम (धर्म दुरै)

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ए आर रहमान के संगीत के माध्‍यम से वैरमुत्तु के काव्‍यब‍िम्‍बों की छटा बॉलीवुड के गीतों में भी ब‍िखरी हैं। पी के म‍िश्रा, जावेद अख्‍तर, और गुलजार ने ए आर रहमान की फ‍िल्‍मों के लि‍ए उनके गीतों को अनूद‍ित करके भी अपनी प्रस‍िद्धी को बढ़ाया है। हालांक‍ि इन महानुभावों को कभी क‍िसी सार्वज‍न‍िक मंच से वैरमुत्तु की काव्‍य प्रत‍िभा की सराहना करते नहीं सुना गया।
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वैरमुत्तु का प्रथम काव्‍य संग्रह “वायगरै मेगंगल” अर्थात् भोर के बादल 1972 में प्रकाश‍ित हुआ जब वे अट्ठारह वर्ष के थे और पचैयप्‍पा महाव‍िद्यालय के व‍िद्यार्थी थे। इसे खूब सराहना म‍िली और इसे वीमेन्‍स क्र‍िश्‍च‍ियन कॉलेज के पाठ्यक्रम में शाम‍िल भी क‍िया गया। साह‍ित्‍य अकादमी से पुरस्‍कृत वैरमुत्तु का अर्ध आत्‍मकथात्‍मक उपन्‍यास “कल्‍ल‍िकाट्ट इत‍िगासम” 1950 में वैगै बांध के न‍िर्माण के ल‍िए जलमग्‍न होने वाले चौदह गांवों और वहां के न‍िवास‍ियों के व‍िस्‍थापन की त्रासदी पर आधारित है। यह उपन्‍यास “नागफनी वन का इत‍िहास” नाम से ह‍िन्‍दी में भी अनूद‍ित हुआ है।
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वैरमुत्तु की कव‍िताएं शास्‍त्रीय तम‍िळ संगम साह‍ित्‍य से प्रेर‍ित होकर प्रतीकात्‍मकता, सामाज‍िक अवधारणाओं और वैश्‍व‍िक मानवता का अन्‍वेषण करती हैं। तमि‍ळ संगम काव्‍य में भूदृश्‍यों को भावनाओं से जोड़ने वाली “त‍िनै” की अवधारणा उनकी रचनाओं में नये रूप में म‍िलती है। उनकी काव्य रचनाओं को तमि‍ळ काव्य की वानमपाड‍ि (भरत पक्षी) परंपरा से जोड़ा जाता रहा है जो क‍ि पाब्‍लो नेरुदा जैसे कव‍ियों से प्रेर‍ित थी और ज‍िसमें वामपंथी व‍िचारधारा, मुक्‍त छंद और रूमानी भावनाओं होती थीं। पुव‍ियरसु और मु मेहता भी इसी परंपरा के तम‍िळ कव‍ि हैं।
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बहुत से तम‍िळ लेखकों का मानना है क‍ि एक गीतकार के रूप में वैरमुत्तु का योगदान भले ही उल्‍लेखनीय हो, उनका साह‍ित्‍यक अवदान क‍ि राजनारायणन, टी जानकीरामन, सुन्दर रामासामी, नन्‍ज‍िल नडन, प्रभंजन, अड़गीय पेर‍ियवन और एस रामाकृष्‍णन ज‍ितना नहीं है। वे वैरमुत्तु के साह‍ित्‍य को आधुनि‍क तम‍िळ साह‍ित्‍य का राष्‍ट्रीय प्रत‍िन‍िध‍ि नहीं मानते हैं।
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पुरस्‍कार के लि‍ए वैरमुत्तु की लालसा क‍िसी से छ‍िपी नहीं रह सकी है। बीस वर्ष पूर्व वैरमुत्तु लेखक वन्‍नन्‍न‍िलवन के यहां फल और उपहार लेकर गये और उनसे आशीर्वाद मांगा। उन्‍हें भ्रम हुआ था क‍ि वन्‍नन्‍न‍िलवन साह‍ित्‍य अकादमी सम‍ित‍ि के सदस्‍य हैं। वन्‍नन्‍न‍िलवन ने उनकी गलतफहमी दूर की और बताया कि‍ साह‍ित्‍य अकादमी सम‍ित‍ि में वे नहीं बल्‍क‍ि वल्‍ल‍िकण्‍णन हैं। वैरमुत्तु न‍िराशा होकर लौटे और जाते जाते अपने साथ लाए गये उपहार भी लेते गये।
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जब ज्ञानपीठ व‍िजेता जयकान्‍तन अपनी मृत्‍युशैय्या पर थे तो वैरमुत्तु उनसे म‍िलने गये और उन्‍हें अपना लघुकथा संग्रह द‍िया, उनकी तस्‍वीर खींची और अपनी प्रशंसा में उनके हस्‍ताक्षर सहि‍त एक पत्र ल‍िखवाया यह कहते हुए क‍ि वैरमुत्तु अगले ज्ञानपीठ के हकदार हैं। यह पत्र प्रकाश‍ित भी हुआ ज‍िस पर जयकान्‍तन के बच्‍चों ने नाराजगी जताई क्‍योंक‍ि उनके अनुसार उनके पि‍ता महीनों से अचेत थे और यह पत्र झूठा था।
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वैसे यह भी कम द‍िलचस्‍प बात नहीं है क‍ि वैरमुत्तु को यह पुरस्‍कार उस सरकार के राज में म‍िला है जो राम के नाम और ह‍िन्‍दी भाषा की अनुशंसा करती है जबक‍ि करुणान‍िध‍ि के करीबी रहे वैरमुत्तु राम की आलोचना और ह‍िन्‍दी का व‍िरोध दोनों कर चुके हैं। इसल‍िए इस पुरस्‍कार को समावेशी भारतीयता और न‍िर्ल‍िप्‍त राजनीत‍ि के दृष्‍ट‍िकोण से भी देखने का प्रयास क‍िया जाना चा‍ह‍िए।